दुनिया इस समय एक गंभीर ऊर्जा संकट के मुहाने पर खड़ी है। मार्च 2026 की शुरुआत से ही वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, विशेष रूप से ईरान युद्ध और रूस-यूक्रेन संघर्ष के नए मोर्चों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों को एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है।
1. होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का संकट
कच्चे तेल की कीमतों में आए हालिया उछाल का सबसे बड़ा कारण ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बढ़ता तनाव है। मार्च के पहले सप्ताह में होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने और वहां टैंकरों पर हुए हमलों ने बाजार में हड़कंप मचा दिया है।
- दुनिया का लगभग 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है।
- इस रास्ते के बाधित होने से बेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें $115-$120 प्रति बैरल के स्तर को छू रही हैं।
2. रूस-यूक्रेन युद्ध का नया मोड़
यूक्रेन द्वारा हाल ही में रूसी तेल रिफाइनरियों और बाल्टिक सागर स्थित एक्सपोर्ट टर्मिनलों (जैसे Primorsk और Ust-Luga) पर किए गए ड्रोन हमलों ने आग में घी का काम किया है। इन हमलों से रूस की तेल निर्यात क्षमता लगभग 40% तक कम हो गई है, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन में भारी कमी आई है।
3. वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
तेल की कीमतों में इस “रॉकेट जैसी बढ़त” का असर सीधा आम आदमी की जेब पर पड़ रहा है:
- महंगाई (Inflation): परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों और आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ रहे हैं।
- डॉलर की मजबूती: तेल के महंगे होने से विकासशील देशों की करेंसी (जैसे भारतीय रुपया) पर दबाव बढ़ रहा है।
- सप्लाई चेन: लाल सागर और होर्मुज में बढ़ते हमलों के कारण जहाजों को लंबे रास्तों से जाना पड़ रहा है, जिससे माल भाड़े (Freight) में भारी इजाफा हुआ है।
4. क्या है आगे की राह?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अगले कुछ हफ्तों में युद्धविराम या तनाव कम करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो कच्चा तेल $150 प्रति बैरल के ऐतिहासिक स्तर को भी पार कर सकता है। फिलहाल, इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) ने आपातकालीन भंडार से तेल छोड़ने का फैसला किया है, लेकिन युद्ध की अनिश्चितता के आगे यह नाकाफी साबित हो रहा है।
